कला बनाम मसाला: क्यों शैलेंद्र की ‘तीसरी कसम’ हारी और दादा कोंडके का ‘तमाशा’ जीता?

दादा कोंडके का फिल्मी इतिहास – यह ‘कला बनाम व्यवसाय’ (Art vs. Commerce) का एक ऐसा ऐतिहासिक विरोधाभास है जो भारतीय सिनेमा के क्रूर सच को उजागर करता है।

भारतीय सिनेमा के इतिहास में दादा कोंडके एक ऐसा नाम रहे जिन्हें या तो बहुत सराहा गया या फिर तीखी आलोचना का सामना करना पड़ा। दादा कोंडके ने मराठी सिनेमा के निर्देशक और प्रोड्यूसर के तौर पर बहुत ही अलग स्तर की फिल्में बनाईं, जिन्हें उनके जमाने में ‘अश्लील’ और ‘बुरा’ तक कहा गया। उनकी फिल्मों के पोस्टर्स अक्सर इतने आपत्तिजनक होते थे कि सड़कों पर लगने के बाद वहां से बहू-बेटियों का गुजरना मुश्किल हो जाता था।

आलोचक उनकी फिल्मों को द्विअर्थी संवादों की वजह से नकारते रहे, लेकिन दादा कोंडके ने कभी नियमों की परवाह नहीं की। इस आलोचना के बावजूद, उन्होंने एक ऐसी भीड़ समेटी जो हिंदी भाषी क्षेत्रों से सीधा मराठी फिल्मों की तरफ खिंची चली आई। यह अपने आप में एक बहुत बड़ी सफलता थी क्योंकि उनकी फिल्म ‘अंधेरी रात में दिया तेरे हाथ में’ एक मेगा हिट साबित हुई थी। उस तरह की सक्सेस उस दौर में हिंदी फिल्मों को भी कभी नहीं मिली।

दादा कोंडके ने अपने करियर की शुरुआत मुंबई में लोक रंगमंच और ‘तमाशा’ से की थी, जहाँ से उन्होंने दर्शकों की नब्ज पहचानना सीखा। वे जानते थे कि ग्रामीण स्तर के निचले तबके के दर्शकों की पसंद क्या है। उन्होंने उस पसंद को पहचाना और अपनी कलात्मकता को एक अलग तरीके से ‘अश्लीलता’ में परोसकर दर्शकों के सामने रख दिया।

वे भीड़ की नब्ज जानते थे और इसीलिए वे सुपरहिट रहे। उनकी सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने लगातार नौ सिल्वर जुबली फिल्में दीं, जो गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज है।
सिनेमा के इस विरोधाभास को समझने के लिए प्रह्लाद अग्रवाल का ‘तीसरी कसम’ पर लिखा लेख एक बड़ा उदाहरण पेश करता है। जहाँ एक तरफ शैलेंद्र जैसा संवेदनशील फिल्मकार था, जिसने ‘तीसरी कसम’ जैसी बेहद सुंदर प्रेम कथा बनाई, लेकिन वे दर्शकों की पसंद को संतुष्ट करने के लिए अपनी कला के स्तर को नीचे नहीं गिरा पाए। शैलेंद्र अपनी उच्च दर्जे की पसंद और कलात्मकता से समझौता नहीं कर सके, जिसका परिणाम यह हुआ कि वह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर सफल नहीं हो पाई और वे एक ही फिल्म के बाद आर्थिक रूप से बर्बाद हो गए।

हालाँकि, समय ने शैलेंद्र की कला को न्याय दिया। उनकी फिल्म ‘तीसरी कसम’ को बाद में राष्ट्रपति पदक, मॉस्को इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल का अवार्ड, बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट एसोसिएशन अवार्ड समेत जापान तक से अनगिनत अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले। उस वैश्विक स्तर का सिनेमा दादा कोंडके कभी नहीं बना पाए, लेकिन उन्हें वह ‘कमर्शियल सक्सेस’ मिली जो शैलेंद्र को कभी नसीब नहीं हुई। यह भारतीय सिनेमा की एक कड़वी हकीकत है कि जहाँ एक फिल्मकार अपनी श्रेष्ठता और सिद्धांतों के कारण गुमनामी और तंगी में चला गया, वहीं दूसरा दर्शकों की निचली रुचियों को भुनाकर इतिहास के पन्नों में सबसे सफल फिल्मकार बन गया।

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