संवादहीन- शेखर जोशी – विस्तृत नोट्स ।

1 – कक्षा नौ की सीबीएसई (CBSE) हिंदी के छात्रों के लिए ‘गंगा’ नाम की एक नई किताब आई है, जिसका तीसरा पाठ ‘संवादहीन’ है, जिसे सुप्रसिद्ध लेखक शेखर जोशी जी ने लिखा है।


2 – पाठ की शुरुआत में बताया गया है कि ताई अक्सर अपने तोते से पूछती थीं, “हे भगवान, मेरी नैया कैसे पार लगेगी?” तब पिंजरे में बंद उछल-कूद मचाता हुआ मिठ्ठू (तोता) उनसे कहता, “तुम राम-राम कहो, सीताराम कहो।” ताई भी वही बात दोहरातीं, “राम-राम, सीताराम।” इस प्रकार मिठ्ठू और ताई के बीच बहुत गहरी दोस्ती दिखाई गई है।


3 – ताई के अतीत के बारे में बताया गया है कि उन्होंने अपने जीवन में बहुत अच्छे और संपन्न दिन देखे थे। उनके घर में बेटे, बहू, बेटियां, पूरा परिवार, नौकर-चाकर और गाय-बैल जैसे कई पालतू जानवर थे। लेकिन समय के साथ सब लोग बाहर चले गए और अपने-अपने परिवारों में सेटल हो गए। धीरे-धीरे ताई की सारी जमीन-जायदाद भी दूसरों के हाथों में चली गई। अब ताई अकेली रह गईं; वे अपने अकेले के लिए क्या ही खाना बनातीं, इसलिए कभी-कभी व्रत-उपवास के बहाने खाना भी नहीं खाती थीं। तभी उनका गणपत नाम का एक परिचित एक पहाड़ी तोता ले आया और उस तोते के बहाने अब घर में दोबारा खाना बनने लगा था।


4 – चूंकि ताई को तोते से बहुत ज्यादा लगाव हो गया था, इसलिए वे पूरे गांव में यह पता रखती थीं कि किसके खेत में हरी मिर्च तैयार हो गई है या किसके पेड़ में सबसे आखिर तक अमरूद आते हैं। ताई मिठ्ठू से बेहद प्यार करने लगी थीं।


5 – ताई ने मिठ्ठू को काफी कुछ सिखा-पढ़ा दिया था और मिठ्ठू ने भी उन बातों को याद कर लिया था; वह कई बार ताई की बातों का सटीक जवाब भी दे देता था। इस वजह से मिठ्ठू आसपास के लोगों के बीच भी बहुत लोकप्रिय (Popular) हो गया और सबको लगने लगा कि मिठ्ठू से सबका मन बहल जाता है। मिठ्ठू सुबह-सुबह ताई को जगाने के लिए ‘हर-हर गंगे, हर-हर गंगे, सीताराम बोल सीताराम’ कहने लगता था। ताई अचानक उठ जातीं और बहुत खुश होती थीं कि उन्होंने कितना अच्छा तोता पाला है, जो उनका इतना ख्याल रखता है और समय पर उठा देता है। वे खुश होकर कहती थीं, “युग-युग जियो, खूब खुश रहो।” मिठ्ठू भी जवाब में कहता, “चलो, तुम भी खुश रहो।” इस बात से ताई का मन आनंद से भर जाता था।


6 – दिनभर का सारा काम निपटाने के बाद, जब ताई अपनी चारपाई पर लेटतीं, तो वे मिठ्ठू को ही अपने अतीत के वैभव की कहानियाँ सुनाने लगती थीं। वे बताती थीं कि उनका कैसा मान-सम्मान था, कैसा भरा-पूरा परिवार और बच्चे थे, और लोग उनका कितना एहसान मानते थे। उनके जमींदार पति उनका कितना ध्यान रखते थे, घर में हाथी-घोड़े थे और तीज-त्यौहारों पर कितनी पार्टियाँ होती थीं। वे यह भी बताती थीं कि उनके पति को कितना गुस्सा आता था और कैसे लोग उनके आगे हाथ बांधकर खड़े रहते थे। मिठ्ठू भी उनकी बातें चुपचाप सुनता रहता था और बीच-बीच में ‘चूँ-चूँ’ कर देता था, जिससे ताई बेहद खुश हो जाती थीं।


7 – चूँकि वह एक बेजुबान पक्षी था, इसलिए कभी-कभी वह अपनी कटोरी उलट देता था या किसी चीज़ की ज़िद करने लगता था। ताई जब थकी हुई होती थीं, तो झुँझलाकर कहती थीं, “पता नहीं क्यों मर जा, जाके मेरी जान खा रहा है!” तब वह तोता भी उन्हें पलटकर वैसी ही बातें सुनाने लगता था। इस तरह नोकझोंक का यह सिलसिला थोड़ी देर चलता, और फिर दोनों एक-दूसरे के साथ खुश हो जाते थे।


8 – ताई को मिठ्ठू से इतना गहरा लगाव था कि वे उसके बिना रह नहीं सकती थीं। वे कभी कहीं बाहर जातीं, तो पिंजरे को बड़े अच्छे से ताले में बंद करके जाती थीं। लेकिन अचानक उनके सामने एक बड़ा धर्म-संकट आ खड़ा हुआ। गांव के कई संभ्रांत और अच्छे लोग कुंभ स्नान के लिए प्रयागराज (इलाहाबाद) जा रहे थे और ताई की भी जाने की इच्छा थी। ताई को चिंता सताने लगी कि अगर वे गईं, तो मिठ्ठू का क्या होगा? टिकट या पैसों की तो कोई बात नहीं थी, लेकिन भीड़भाड़ में यदि उनका मिठ्ठू खो गया तो वे क्या करेंगी? उन्हें यह चिंता खाए जा रही थी कि मिठ्ठू की जिम्मेदारी किसे सौंपकर जाएं, ताकि वे निश्चिंत होकर कुंभ स्नान कर सकें।


9 – गांव के एक शिक्षक, जगन मास्टर की घरवाली ने ताई से कहा कि वे मिठ्ठू को अपने पास रख लेंगी और ताई आराम से घूमकर आ जाएं। ताई ने उन पर बड़ा भरोसा किया और रोते-कलपते हुए मिठ्ठू को उन्हें सौंप दिया। जाते समय भी मिठ्ठू उनसे ‘सीताराम, राम-सीताराम’ कहता रहा। मिठ्ठू को भी लगा कि वह जगन मास्टर की पत्नी के साथ आराम से रह लेगा।


10 – जगन मास्टर की पत्नी ने तोते को रखने का वादा तो कर लिया, लेकिन इस वजह से उनके घर में बहुत झगड़ा हुआ। जगन मास्टर स्वभाव से बहुत बड़े पशु-प्रेमी थे। वे मानते थे कि उनकी वजह से किसी बेजुबान पर अत्याचार या परेशानी नहीं होनी चाहिए। वे जब भी पिंजरे में बंद मिठ्ठू को देखते, तो उन्हें अपनी पत्नी पर बहुत गुस्सा आता और खुद भी गहरी आत्मग्लानि (Guilt) महसूस होती थी कि ताई के जाने के बाद उन्होंने इस मासूम पक्षी को कैद कर रखा है। यह सोचकर उन्हें बहुत बुरा लगता था।


11 – जगन मास्टर ने अपनी इस आत्मग्लानि (Guilt) से मुक्त होने के लिए एक तरकीब निकाली। वे कमरे के दरवाजे-खिड़कियां बंद कर देते और पिंजरा खोलकर बाहर थोड़ा सा अनाज बिखेर देते थे। मिठ्ठू बाहर आकर टहलता और अनाज चुग लेता था। इसके बाद वे उसे वापस पिंजरे में बंद करके चैन की सांस लेते थे। अब यह उनका रोज़ का नियम बन गया था। उन्हें लगता था कि वे रोज़ थोड़ी देर के लिए उस तोते को आज़ादी का सुख दे रहे हैं। तीन-चार दिनों तक यह सिलसिला बहुत अच्छे से चला।


12 – पुराने ज़माने के मकानों के कमरों में रोशनदान हुआ करते थे। तीन-चार दिन तक तो यह क्रम ठीक चला कि तोता बाहर आता, अनाज खाता और जगन मास्टर उसे पकड़कर वापस पिंजरे में रख देते। लेकिन एक दिन तोते की नज़र कमरे के खुले रोशनदान पर पड़ गई। वह फुदककर रोशनदान पर पहुँचा और वहाँ से बाहर उड़ गया। उस समय जगन मास्टर ‘गीता रहस्य’ नामक पुस्तक पढ़ रहे थे। जब तक उनका ध्यान गया और वे अनाज लेकर ‘आजा-आजा’ कहते हुए दौड़े, तब तक मिठ्ठू रोशनदान के रास्ते खुले आसमान में जा चुका था। आदर्शवादी जगन मास्टर, जो सबको आज़ाद रखने की वकालत करते थे, अब व्याकुल होकर बगीचे में एक पेड़ से दूसरे पेड़ की ओर ‘मिठ्ठू आजा, मिठ्ठू आजा’ पुकारते हुए भाग रहे थे। उधर मिठ्ठू आज़ाद होकर इधर-उधर उड़ते हुए यह देख रहा था कि उसके पंखों में कितनी उड़ान बाकी है।


13 – अब ताई के वापस लौटने का समय नज़दीक आ रहा था और दिन तेज़ी से गुज़र रहे थे। इस घटना से गांव के सभी लोग बहुत डर गए, क्योंकि सबको पता था कि ताई का स्वभाव बहुत तेज़ है और वे मिठ्ठू से कितना गहरा लगाव रखती हैं। अगर उन्हें मिठ्ठू नहीं मिला, तो वे क्या गदर मचाएंगी, यह सोचकर सब परेशान थे। काफी सोच-विचार के बाद, गणपत ने जगन मास्टर को सलाह दी कि वे मिठ्ठू जैसा ही एक दूसरा तोता ले आएं, ताकि ताई इसी भ्रम में रहें कि यह उनका ही तोता है। अगले ही दिन गणपत वैसा ही एक दूसरा तोता पकड़कर ले आया।


14 – अब जगन मास्टर उस नए तोते को पिंजरे में रखकर दिन-रात पढ़ाने लगे कि ताई के आने से पहले वह कुछ शब्द सीख ले। ताई के आने का समय जैसे-जैसे पास आ रहा था, जगन मास्टर खाना-पीना छोड़कर इतने फिक्रमंद हो गए कि घंटों पिंजरे के सामने बैठकर रटने लगते—’मिठ्ठू राम-राम, सीता-राम, हर-हर गंगे, राम-राम, सीता-राम।’ बोलते-बोलते उनका गला सूख जाता था। जब उनकी पत्नी उनसे खाना खाने को कहती, तो वे उसे बहुत गुस्से भरी नज़रों से देखते थे। लेकिन उस नए तोते ने कुछ नहीं सीखा; वह बस टुकुर-टुकुर उन्हें देखता रहता था, मानो सोच रहा हो कि यह कौन बेवकूफ है जो मुझे ज़बरदस्ती सिखाए जा रहा है।


15 – जब ताई कुंभ स्नान से लौटीं, तो स्टेशन से बाकी सब लोग अपने-अपने घर चले गए, लेकिन ताई सीधे जगन मास्टर के घर पहुँचीं। उनके मन में था कि उनका मिठ्ठू उन्हें बहुत मिस कर रहा होगा, याद कर रहा होगा और उन्हें देखते ही खुशी से आसमान सिर पर उठा लेगा। लेकिन पिंजरे में मौजूद उस नए तोते ने ताई को देखकर कोई प्रतिक्रिया (Reaction) नहीं दी, क्योंकि वह तो उन्हें जानता ही नहीं था। वह बस अजनबियों की तरह इधर-उधर देखता रहा। ताई ने उसे ‘मिठ्ठू-मिठ्ठू’ कहकर पुकारना शुरू किया, लेकिन उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि उनका असली मिठ्ठू तो न जाने कहाँ आम के बगीचों में आज़ादी से घूम रहा होगा और उन्हें धोखे से एक दूसरा अजनबी तोता थमा दिया गया है।


16 – यह ‘संवादहीन’ कहानी मुख्य रूप से हमें चार महत्वपूर्ण बातें सिखाती है। पहली बात यह कि यदि हम अपने घर के बड़े-बुजुर्गों का हाल-चाल नहीं पूछेंगे, उनकी देखभाल नहीं करेंगे, तो अकेलेपन के दौरान उन्हें जो भी साथी (चाहे वह कोई बेजुबान पक्षी ही क्यों न हो) मिलेगा, वे उस पर पूरी तरह विश्वास करने लगेंगे।


17 – दूसरी बात यह कि अकेलेपन में इंसान को जो भी सहारा या साथी मिल जाता है, उससे उसका बहुत गहरा और ज़रूरत से ज़्यादा भावनात्मक लगाव हो जाता है।


18 – तीसरी बात यह कि यदि आप किसी की जिम्मेदारी को पूरी ईमानदारी से नहीं निभा सकते, तो उस जिम्मेदारी को अपने ऊपर मत लीजिए। क्योंकि यदि आपने जिम्मेदारी ली और उसे सही से नहीं निभाया, तो आपको मानसिक प्रताड़ना सहनी पड़ेगी और सब कुछ करने के बाद भी आप अंत में केवल मज़ाक का पात्र बनेंगे। इसलिए जिम्मेदारी या तो लीजिए मत, और अगर ली है तो उसे पूरी निष्ठा से निभाए तथा बदले में किसी अपेक्षा को मत रखिए।


19 – चौथी और अंतिम सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि आप अपनी जिम्मेदारी दूसरों को सौंपकर यह सोच रहे हैं कि वे उसे आपकी ही तरह निभा लेंगे, तो ऐसी उम्मीद करना छोड़ दीजिए। यह कतई ज़रूरी नहीं है कि जो भावना और लगाव आपके भीतर है, वही भावना सामने वाले के मन में भी हो। निष्कर्षतः, यह पाठ बेहद मार्मिक है और बुजुर्गों के अकेलेपन व हमारी सामाजिक ज़िम्मेदारियों को लेकर एक बहुत बड़ा सबक देता है।

– पाठ पर आधारित महत्वपूर्ण प्रश्न व उत्तर –

प्रश्न 1: ‘संवादहीन’ पाठ के आधार पर ताई और मिठ्ठू (तोते) के बीच के संबंध को स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: पाठ की शुरुआत में ताई और मिठ्ठू के बीच एक बहुत ही गहरा और आत्मीय संबंध दिखाया गया है। ताई जब भी अपने अकेलेपन से परेशान होकर भगवान से अपनी नैया पार लगाने की गुहार लगाती थीं, तो मिठ्ठू पिंजरे में उछल-कूद करते हुए उन्हें ‘राम-राम, सीताराम’ कहने को कहता था। ताई भी उसकी बात दोहराकर ढांढस पाती थीं। मिठ्ठू सिर्फ एक पक्षी नहीं, बल्कि ताई के सूने जीवन का एकमात्र सहारा और सबसे घनिष्ठ मित्र बन चुका था।


प्रश्न 2: ताई के अतीत और वर्तमान की स्थिति में क्या बदलाव आया था?
उत्तर: ताई ने अतीत में बहुत संपन्न और खुशहाल दिन देखे थे। उनका परिवार भरा-पूरा था, जिसमें बेटे, बहू, बेटियां, नौकर-चाकर और कई पालतू जानवर शामिल थे। उनके पति जमींदार थे और समाज में उनका बड़ा मान-सम्मान था। लेकिन समय के साथ बच्चे बाहर सेटल हो गए और जमीन-जायदाद भी दूसरों के हाथों में चली गई। वर्तमान में ताई बिल्कुल अकेली रह गईं, जहाँ वे अपने लिए खाना बनाने में भी उदासीनता बरतने लगी थीं।


प्रश्न 5: सुबह के समय मिठ्ठू ताई के प्रति अपनी फिक्र और लगाव किस प्रकार प्रकट करता था?
उत्तर: मिठ्ठू सुबह होते ही ताई को जगाने की जिम्मेदारी खुद संभाल लेता था। वह सुबह-सुबह ‘हर-हर गंगे, हर-हर गंगे, सीताराम बोल सीताराम’ कहकर ताई को उठाना शुरू कर देता था। ताई उसकी इस समझदारी और फिक्र को देखकर निहाल हो जाती थीं। वे उसे ‘युग-युग जियो’ का आशीर्वाद देती थीं, जिसके जवाब में मिठ्ठू भी ‘चलो तुम भी खुश रहो’ कहता था। यह सुबह का संवाद दोनों के आपसी प्रेम को दर्शाता है।


प्रश्न 4: ताई अपनी चारपाई पर लेटने के बाद मिठ्ठू से अपने दिल की कौन सी बातें साझा करती थीं?
उत्तर: दिनभर के कामकाज से थककर जब ताई चारपाई पर लेटती थीं, तो वे मिठ्ठू को अपने पुराने वैभव के दिनों की कहानियाँ सुनाती थीं। वे उसे बताती थीं कि कैसे उनके पति का समाज में रसूख था, लोग उनके आगे हाथ बांधकर खड़े रहते थे, घर में हाथी-घोड़े थे और त्यौहारों पर बड़ी पार्टियाँ होती थीं। मिठ्ठू भी एक सच्चे श्रोता की तरह चुपचाप उनकी बातें सुनता था और बीच-बीच में ‘चूँ-चूँ’ करके अपनी सहमति जताता था।


प्रश्न 5: बेजुबान पक्षी होने के कारण कभी-कभी मिठ्ठू क्या हरकतें करता था और ताई की उस पर क्या प्रतिक्रिया होती थी?
उत्तर: मिठ्ठू कभी-कभी अपनी कटोरी को उलट देता था या किसी चीज़ की मांग करते हुए ज़िद करने लगता था। जब ताई बहुत थकी होती थीं, तो वे झुँझलाकर उसे डांटते हुए कहती थीं, “पता नहीं क्यों मर जा, जाके मेरी जान खा रहा है।” मिठ्ठू भी बेजुबान होते हुए अपनी आवाज़ों में ताई को पलटकर जवाब देता था। यह एक स्वाभाविक नोकझोंक थी, जिसके तुरंत बाद दोनों फिर से एक-दूसरे के साथ खुश हो जाते थे।


प्रश्न 6: कुंभ स्नान पर जाते समय ताई के सामने क्या धर्म-संकट था और उन्होंने उसका क्या समाधान निकाला?
उत्तर: जब गांव के लोग कुंभ स्नान के लिए प्रयागराज जा रहे थे, तो ताई के सामने यह संकट था कि वे मिठ्ठू को अकेले कैसे छोड़ें। उन्हें डर था कि भीड़भाड़ में मिठ्ठू कहीं खो न जाए। पैसों या टिकट की समस्या नहीं थी, बल्कि मिठ्ठू की सुरक्षा सर्वोपरि थी। अंततः, गांव के जगन मास्टर की पत्नी द्वारा मिठ्ठू की जिम्मेदारी लेने का भरोसा देने पर, ताई भारी मन और रोते-कलपते हुए मिठ्ठू को सौंपकर कुंभ स्नान के लिए रवाना हुईं।


प्रश्न 7: जगन मास्टर को मिठ्ठू को पिंजरे में देखकर आत्मग्लानि (Guilt) क्यों होती थी?
उत्तर: जगन मास्टर स्वभाव से एक सच्चे पशु-प्रेमी और आदर्शवादी व्यक्ति थे। उनका मानना था कि किसी भी जीव को कैद में रखना उस पर अत्याचार करने जैसा है। जब भी वे ताई के जाने के बाद मिठ्ठू को पिंजरे में बंद देखते, तो उन्हें अपनी पत्नी के फैसले पर गुस्सा आता और खुद भी गहरी आत्मग्लानि होती थी। उन्हें लगता था कि वे एक आज़ाद पक्षी की स्वतंत्रता छीनने के अपराध में भागीदार बन रहे हैं।


प्रश्न 8: जगन मास्टर ने अपनी आत्मग्लानि दूर करने के लिए क्या तरकीब निकाली और उसका क्या परिणाम हुआ?
उत्तर: जगन मास्टर ने खुद को दोषमुक्त करने के लिए एक तरकीब निकाली कि वे कमरे के खिड़की-दरवाजे बंद करके पिंजरा खोल देते थे और बाहर थोड़ा अनाज बिखेर देते थे। मिठ्ठू बाहर आकर आज़ादी से टहलता और दाना चुगता था। लेकिन तीन-चार दिन बाद, एक दिन मिठ्ठू की नज़र कमरे के खुले रोशनदान पर पड़ गई। वह फुदककर सीधे रोशनदान से बाहर खुले आसमान में उड़ गया और जगन मास्टर की पकड़ में नहीं आया।


प्रश्न 9: मिठ्ठू के उड़ जाने के बाद गांव वालों ने क्या योजना बनाई और जगन मास्टर को किस परेशानी का सामना करना पड़ा?
उत्तर: मिठ्ठू के उड़ने से पूरा गांव डर गया क्योंकि सब जानते थे कि ताई का स्वभाव बहुत तेज़ है और वे मिठ्ठू के बिना नहीं रह सकतीं। तब गणपत की सलाह पर मिठ्ठू जैसा ही एक दूसरा अजनबी तोता लाया गया। जगन मास्टर दिन-रात खाना-पीना छोड़कर उस नए तोते को ‘राम-राम, सीताराम’ रटाने में जुट गए ताकि ताई को शक न हो। बोलते-बोलते उनका गला सूख जाता था, लेकिन उस तोते ने कुछ नहीं सीखा।


प्रश्न 10: कुंभ से लौटने पर ताई के साथ क्या धोखा हुआ और यह कहानी समाज को क्या संदेश देती है?
उत्तर: कुंभ से लौटने पर ताई बड़ी उम्मीद से मिठ्ठू से मिलने पहुँचीं, लेकिन पिंजरे में बंद नए तोते ने उन्हें देखकर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। ताई को धोखे से एक अजनबी तोता थमा दिया गया और उनका असली मिठ्ठू आज़ाद हो चुका था। यह कहानी संदेश देती है कि समाज और परिवार में बुजुर्गों के अकेलेपन को समझा जाना चाहिए। यदि हम उन्हें समय और संवाद नहीं देंगे, तो वे बेजुबानों पर निर्भर हो जाएंगे, और हमारी लापरवाही उनके भावनात्मक संसार को उजाड़ सकती है।

Navigating family transitions with grace.

• 1. Stay diplomatic and keep a smile on your face at all times. Otherwise, he will be hers forever; things have already started.

• 2. Start calling him and sending him lists of things to buy. Ask his girlfriend to help him shop for the house, and ask him to buy things you like, such as ice cream or specific meals.

• 3. “My card is stuck. Could you please pay this bill for me?”

• 4. Start with small financial requests—perhaps two expenses per week.

• 5. It’s possible that his girlfriend is guiding him to act this way.

• 6. Take him along when visiting friends and relatives. Have a few relatives ask him about his contributions to the home and remind him how hard his mother worked for him.

• 7. Plant the idea of buying a new, bigger house so that you can all live together happily forever.

• 8. Look at properties on Instagram and start going out to view them. This will keep him busy and focused on you.

• 9. Look for a new, fancy car and have him go on a few test drives. Let him spend some money on himself as well.

Summary: The strategy is simple: keep him busy and keep him spending on the home.