
अब कहाँ दूसरों के दुख से दुखी होने वाले (लेखक: निदा फ़ाज़ली)
1. **लेखक परिचय:** इस पाठ के लेखक निदा फ़ाज़ली हैं। उनका जन्म 12 अक्टूबर 1938 को दिल्ली में हुआ, बचपन ग्वालियर में बीता और बाद में वे मुंबई जाकर बस गए। बॉलीवुड के लिए गीत-लेखन और शेर-ओ-शायरी में उनका योगदान अद्वितीय है। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था और उनकी प्रसिद्ध किताब ‘खोया हुआ सा कुछ’ है। 8 फरवरी 2016 को उनका निधन हुआ।
2. **मुख्य विषय (पर्यावरण और मानव स्वार्थ):** निदा फ़ाज़ली ने इस पाठ में ग्लोबल वार्मिंग और प्रकृति के विनाश पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उनका मानना है कि यह धरती सभी जीवधारियों के लिए बनी थी, लेकिन मनुष्य ने अपने स्वार्थ में हर जगह कब्ज़ा कर लिया है और पशु-पक्षियों व पेड़-पौधों के लिए जगह ही नहीं छोड़ी है।
3. **सुलेमान का प्रसंग:** लेखक ने बाइबल और कुरान में वर्णित बादशाह सुलेमान का उल्लेख किया है, जो ईसा से 1025 वर्ष पूर्व हुए थे। वे केवल मनुष्यों के ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षियों और पेड़-पौधों के भी बादशाह थे और उनकी भाषा समझते थे। उन्होंने चींटियों को भी संरक्षण देने का भरोसा दिलाया था।
4. **पशु-पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता:** लेखक ने सिंधी कवि शेख अयाज़ के पिता का उदाहरण दिया है, जो बांह पर बैठे चींटे को छोड़ने के लिए वापस कुएं तक गए थे। साथ ही, नूह नामक पैगंबर का ज़िक्र किया है, जो एक कुत्ते का दिल दुखाने के कारण जीवन भर पछतावे के आंसू बहाते रहे।
5. **जीवन और प्रकृति की एकता:** लेखक ने तीन छोटी कविताओं के माध्यम से यह संदेश दिया है कि हम सभी अंततः मिट्टी में विलीन हो जाते हैं, ईश्वर की आराधना के तरीके भले अलग हों पर भाव एक है, और प्रकृति (सूरज) सबको उनकी भूमिका और कार्य बाँटती है। ये सब मिलकर प्रकृति के अनुशासन को दर्शाते हैं।
6. **महाभारत और मानव का स्वार्थ:** महाभारत के युधिष्ठिर और कुत्ते के प्रसंग द्वारा लेखक ने मानव और पशुओं के बीच के अटूट रिश्ते को याद दिलाया है। लेखक के अनुसार, इंसान ने अपनी बढ़ती आबादी और स्वार्थ के कारण प्रकृति का संतुलन बिगाड़ दिया है। प्रदूषण और मिट्टी के ढेर ने समंदर तक को पीछे ढकेल दिया है।
7. **समुद्र का विद्रोह:** लेखक ने मुंबई का उदाहरण दिया है जहाँ बिल्डर्स ने समुद्र की ज़मीन हथियाने की कोशिश की। प्रतिशोध में समुद्र ने अपने जहाजों को गेंद की तरह उछालकर शहर के विभिन्न हिस्सों में फेंक दिया, जो इस बात का प्रतीक है कि प्रकृति का अपमान करने पर परिणाम घातक होते हैं।
8. **लेखक की माँ का व्यक्तित्व:** लेखक की माँ प्रकृति प्रेमी थीं। वे सूर्यास्त के समय पत्ते न तोड़ने, फूल को बद्दुआ न देने, नदी को सलाम करने और पक्षियों को परेशान न करने की सीख देती थीं। कबूतरों के अंडे टूटने पर उनकी माँ का विलाप और दुआ करना उनके विशाल और संवेदनशील हृदय को दर्शाता है।
9. **निष्कर्ष (आज की वास्तविकता):** पाठ का अंत वर्तमान की एक कड़वी सच्चाई से होता है। ग्वालियर से मुंबई आने पर लेखक के घर के रोशनदान में कबूतरों के लिए जाली लग गई, जिससे वे बेघर हो गए। लेखक अपनी माँ की संवेदनशीलता और आज के दौर में बढ़ती संवेदनहीनता के बीच का अंतर देखकर दुखी हैं। जंगल कटने से पशु-पक्षी बेघर हो रहे हैं और अब इस दुनिया में दूसरों के दुख से दुखी होने वाला कोई नहीं बचा है।