Masaan Movie – Belated review!


कई बार लंबी दूरी के ट्रैन के सफर करते हुए हमें बहुत अच्छे लोग सहयात्री के रूप में मिल जाते हैं. मसान फिल्म उसी अच्छे सहयात्री की तरह आपको सम्मोहित कर जाती है.

हम उत्तर भारत वासियों को एक अच्छी फिल्म मसान बड़े लंबे समय के बाद देखने को मिली है. ये एक ऐसी देखने योग्य जीवन की परिभाषा है जो हर माता पिता और संघर्ष शील युवा के मन को व्यक्त करती है. 

न जाने क्यों बॉलीवुड के बड़े लोग और जाने माने समीक्षक इस तरह की फिल्मों को देखने के लिए लोगों को प्रेरित नहीं करते परंतु सनी लेओनी या कंगना राणावत की फिल्मों की तारीफ करते नहीं थकते. 

मसान जैसी फिल्में अगर बड़े मल्टीप्लेक्सेज दिखाने लगें तो लोगों में एक सकारात्मक सोच को बढ़ावा मिलेगा और जीवन में यथार्थ से जुड़े रहने की प्रेरणा भी मिलेगी जो सिर्फ आईफोन खरीदने के जंगल में गुम हो चली है.

मसान पे जीवन गुजरने वालों के बच्चों का मानसिक द्वन्द हो या फिर पुलिस प्रताड़ना से गुजरता गरीब पांडे हो या हो कानून की धज्जियाँ उड़ाता घाटों का डुबकी सत्ता, मसान फिल्म का हर मोड़ दर्शक के आगे वोही रोमांच परस देता है जिसके अंत में हर छोटे से चमत्कार के रूप में दर्शक खुश होके पूरा स्वाद ले जाता है चाहें वो सरकारी नौकरी का मिलना हो या फिर अंगूठी का मिलना. 

एक बेहद असंभव पर सुखद अंत आपको उस घनी निराश से उबार सा लेता है जोकि बाजीराव मस्तानी के अंत को देखने पे कभी आपके मन में बैठ सी गयी थी. 

बहुत ही उम्दा फिल्म है जो हर संघर्ष से गुजरते युवा को मानो एक आशा का सागर थम देती है. अभिनय की जितनी तारीफ की जाये उतनी ही कम है. 

ऋचा चड्ढा बेहद मंजी हुयी अदाकारा हैं जो खुद को बेहद तराश के पेश करती हैं. अगर आपने दावत ऐ इश्क मूवी में परिणीति चोपड़ा की स्तरहीन एक्टिंग देखी हो तो आपको समझ आएगा की ऋचा चड्ढा भारतीय सिनेमा जगत के लिए स्मिता पाटिल की खाली जगह भरने का काम कर रही हैं.

संजय मिश्रा तो इसी तरह के कशमकश से जूझते पिता के किरदारों के लिए बने हैं जैसे. श्वेता त्रिपाठी बेहद सुन्दर हैं और ताज़ा ताज़ा तोड़ा हुआ गुलाब बनके दर्शकों के दिल में बस ही जाती हैं. विक्की कौशल एक अचंभित करने वाले गूढ़ किरदार को मानो जी ही उठे. उनको बाद में इंजिनीयर का हेलमेट पहने देख काम करते बहुत आशीर्वाद देने का मन हुआ. 

झोंटा जैसे नन्हे बच्चे से भी निर्देशक बड़ी कुशलता से बढ़िया काम करवा के ले गए. 

मैंने एक बहुत बड़े समीक्षक का समीक्षा कॉलम पढ़ के ये मूवी सिनेमा में नहीं देखी थी. आज बहुत ही अजीब सा मन हुआ की कैसे इतनी बेहतरीन फिल्मों को हतोत्साहित करके बोझिल करार दे दिया जाता है. 

आपने अगर ऐश्वर्या राय और अजय देवगन की रेनकोट फिल्म देखी हो तो उसमें शुरुआत में एक गाना है “मथुरा नगरपति तुम काहे गोकुल जाओ” इस तरह के एक गीत की कमी खटकती है कहीं न कहीँ….

जो लोग ऊँचे स्टूडियो में बैठ के कॉफी पीते हुए कहते हैं की ये सिर्फ उत्तर भारत वासियों की फिल्म हैं उन्होंने शायद काशी बाबा या द्वारिकाधीश जी के दरबार में खड़े लाखों तमिलों को, केरल वासियों को, मराठी मानुस को और न ही बांग्लाभाषी लोगों को कभी देखा होगा. 

इस फिल्म से हर भारत वासी कुछ लम्हे ऐसे जी लेता है जो कहीं न कहीं उसकी जिंदगी से भी जुड़े हैं. 

निर्देशक नीरज घायवान और निर्माता को एक बेहतरीन फिल्म बनाने के लिए सलाम! 

Leave a Reply